NOVEMBER 18, 2025
एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है,
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना।
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काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर,
फूलों की सियासत से भी मैं बेगाना नहीं हूँ।
गुनाहों को न जाने कहां पर बांट लेती है,
सियासत थूककर फिर उसी को चाट लेती है।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।
औरों के ख़यालात की लेते हैं तलाशी,
और अपने गरेबान में झाँका नहीं जाता।
मात्रभूमि के साथ में, जो करते हैं गद्दारी,
दुश्मनों से भी ज्यादा, होते हैं वो गुनहगारी।
समझने ही नहीं देती सियासत हमें सच्चाई,
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पन नहीं मिलता।
दुश्मन से ऐसे कौन भला जीत पाएगा,
जो दोस्ती के भेस में छुप कर दग़ा करे।
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