अश्वमेध यज्ञ और वह रहस्यमयी नेवला: क्या दान केवल धन से होता है?
महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद, पांडवों ने हस्तिनापुर का राजपाट संभाला। भगवान श्री कृष्ण के परामर्श पर महाराज युधिष्ठिर ने 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन किया। यह यज्ञ इतना भव्य था कि दूर-दूर से राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि और दीन-दुखियों को आमंत्रित किया गया था। दान में सोने-चांदी की नदियां बह रही थीं और हर तरफ युधिष्ठिर की उदारता के गुणगान हो रहे थे।
पांडवों के मन में भी थोड़ा संतोष (और सूक्ष्म अहंकार) आने लगा था कि उन्होंने इतिहास का सबसे बड़ा दान-पुण्य किया है। तभी वहां एक विचित्र नेवला प्रकट हुआ, जिसका आधा शरीर सोने का था और आधा साधारण।
नेवले का अट्टहास: "यह यज्ञ उस गरीब ब्राह्मण के सेर भर सत्तू के बराबर भी नहीं!"
यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद जब ब्राह्मणों को विदा किया जा रहा था, तब वह नेवला यज्ञशाला के बीचों-बीच लोटने लगा। फिर वह मनुष्य की आवाज़ में बोला— "हे राजन! आपका यह महान यज्ञ कुरुक्षेत्र के उस निर्धन ब्राह्मण के मुट्ठी भर सत्तू के दान के बराबर भी नहीं है।"
यह सुनकर युधिष्ठिर और वहां उपस्थित सभी लोग चकित रह गए। उन्होंने पूछा— "विचित्र जीव! तुम यह क्या कह रहे हो? यहाँ लाखों लोगों को तृप्त किया गया है, करोड़ों की स्वर्ण मुद्राएं दान दी गई हैं। तुम किस ब्राह्मण की बात कर रहे हो?"
एक निर्धन परिवार का सर्वोच्च बलिदान
नेवले ने कहानी सुनाना शुरू किया: "कुरुक्षेत्र में एक गरीब ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था। वह 'उंछ-वृत्ति' (खेतों में गिरे हुए दानों को चुनकर गुज़ारा करना) का पालन करता था। एक बार वहां भयंकर अकाल पड़ा। कई दिनों तक उस परिवार को अन्न का एक दाना भी नसीब नहीं हुआ।"
नेवले ने आगे बताया कि कई दिनों के उपवास के बाद, उस ब्राह्मण को एक दिन थोड़ा सा जौ मिला, जिससे उन्होंने 'सत्तू' तैयार किया। जैसे ही वे खाने बैठे, उनके द्वार पर एक भूखा अतिथि आ गया।
- पिता का त्याग: ब्राह्मण ने अपने हिस्से का सत्तू अतिथि को दे दिया, पर अतिथि की भूख शांत नहीं हुई।
- परिवार का समर्पण: बारी-बारी से ब्राह्मण की पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू ने भी अपने-अपने हिस्से का भोजन अतिथि को दे दिया, जबकि वे खुद भूख से प्राण त्यागने की स्थिति में थे।
- अंत: भोजन ग्रहण करने के बाद अतिथि (जो स्वयं धर्मराज थे) प्रसन्न हुए और उस परिवार को स्वर्ग प्राप्त हुआ।
नेवले का आधा शरीर सुनहरा कैसे हुआ?
नेवले ने कहा— "मैं उस समय उसी घर के कोने में दुबका था। जब उस परिवार ने भोजन किया, तो सत्तू के कुछ कण फर्श पर गिर गए थे। जब मैं उन कणों पर लोटा, तो उन दानों में छिपे उस परिवार के 'त्याग' के प्रभाव से मेरा आधा शरीर सोने का हो गया।"
नेवले ने तंज कसते हुए कहा— "तब से मैं दुनिया के हर बड़े यज्ञ और दान-समारोह में जाता हूँ कि शायद किसी और के दान में इतनी शक्ति हो कि मेरा बाकी का शरीर भी सुनहरा हो जाए। मैं आपके इस अश्वमेध यज्ञ में भी आया, यहाँ की धूल में भी लोटा, पर मेरा शरीर वैसा का वैसा ही रहा। इसका अर्थ है कि आपके इस करोड़ों के दान में वह शक्ति नहीं थी, जो उस गरीब के मुट्ठी भर सत्तू में थी।"
निष्कर्ष: दान की महिमा सामग्री में नहीं, भाव में है
यह सुनकर पांडवों का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्हें समझ आया कि दान बड़ा तब नहीं होता जब वह प्रचुरता (Abundance) में दिया जाए, बल्कि तब बड़ा होता है जब वह अपनी अत्यंत कमी (Sacrifice) के बावजूद निस्वार्थ भाव से दिया जाए।
- अहंकार का त्याग: सच्चा दान वह है जिसमें 'मैं दे रहा हूँ' का भाव न हो।
- करुणा की शक्ति: दूसरों के दुख को अपने दुख से ऊपर रखना ही असली धर्म है।
- शुद्धता: पवित्रता धन की मात्रा में नहीं, बल्कि मन की नियत में होती है।
स्रोत: यह कथा महाभारत के 'आश्वमेधिक पर्व' (अध्याय 90) में वर्णित है।