जातिवाद पर बेहतरीन मशहूर शायरियां
दोस्तों, हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे समाज के पैरों में आज भी 'जातिवाद' की बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं। जाति, धर्म और ऊंच-नीच का भेदभाव एक ऐसा दीमक है जो हमारी इंसानियत और देश की तरक्की को खोखला कर रहा है।
शायर और कवि समाज का आईना होते हैं। उन्होंने हमेशा अपनी कलम से इस भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाई है। आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपके लिए लाए हैं जातिवाद पर 50 मशहूर शायरियों और दोहों का संकलन। इसमें संत कबीर की निर्भीक वाणी से लेकर अदम गोंडवी के तीखे व्यंग्य तक शामिल हैं।
आइए, इन पंक्तियों को पढ़ें और एक ऐसे समाज की कल्पना करें जहाँ इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से हो।
Best Shayari on Castism
डिग्रियां तो ले लीं, पर दिमाग में वही जाला है,
बराबरी का रंग इनके लिए आज भी काला है।
तू पूछता है मेरी जात, मेरी पहचान से पहले,
मैं पूछता हूँ तेरी सोच, तेरे इंसान से पहले।
जाति की दीवारों ने देश को बहुत तोड़ा,
वरना आज तो हर हाथ में हुनर होता।
माथे पर तिलक, दिल में उजाला होना चाहिए,
जाति से नहीं, कर्म से इंसान निराला होना चाहिए।
तू ऊँचा है अगर, तो हाथ बढ़ाकर दिखा,
कुचलकर नीचे रखना कोई बहादुरी नहीं होती।
जाति का ज़हर पीकर लोग धर्म बचाने निकले हैं,
इंसान मर रहा है, ये किसके सिपाही निकले हैं?
जो मेहनत से खड़ा है, वो जात का मोहताज नहीं,
पसीने का कोई गोत्र नहीं, ये बात समाज को याद हो।
इतिहास गवाह है, जब-जब जाति हावी हुई,
तब-तब मानवता सबसे पहले मारी गई।
पुस्तकों से ज़्यादा ज़रूरी है दिल की किताब पढ़ना,
जाति मिटेगी तभी जब इंसान सीखेगा इंसान बनना।
एक ही हवा, एक पानी, एक ही धरती हमारी,
फिर किस हक़ से बाँट रहे हो ये इंसानियत सारी?
खौफ ये नहीं कि कोई पीछे रह जाएगा साहब,
दर्द ये है कि कोई बराबर में आकर बैठ जाएगा।
21वीं सदी की बातें हैं, सोच वही सड़न है,
बराबरी इनके लिए जैसे बदन में जलन है।
ऊपर बैठने की आदत इन्हें कुछ ऐसी लग गई है,
ज़मीन की बात करो तो जैसे दुनिया ठग गई है।
खुद को सताया बताने की क्या गजब कला है,
बराबरी का हर नियम इनके लिए एक बला है।
न्याय तराजू को भी अपनी ओर झुकाना चाहते हैं,
परंपरा के नाम पर बस अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं।
'मेरिट' का कत्ल हो गया, ये शोर मचाते हैं,
पर सदियों के भेदभाव को ये भूल ही जाते हैं।
तारीखों की भूलभुलैया में हकीकत खो जाएगी,
बराबरी की ये फाइल फिर से दफ़न हो जाएगी।
जब सबको मिलने लगे हक, तो उसे 'खैरात' कहते हैं,
खुद के विशेषाधिकार को ये 'बिसात' कहते हैं।
सबके माथे पर लिखा है 'हम हैं सच्चे हिन्दुस्तानी',
मौका आने पर 'जात' ही सबकी पहचान होती है।
हिंदू होने का गुरूर तो बहुत दिखाया गया,
जब सच आया, तो उन्हें ही 'पिछड़ा' बताया गया।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
जाति की दीवारें खड़ी कर जो कर रहे हैं सियासत,
उन चेहरों की असलियत सबको दिखनी चाहिए।
बड़े ही सलीके से उन्होंने धर्म की खाल ओढ़ रखी है, भीतर झाँको तो नफरत की जातिवादी आग जला रखी है।
वक़्त आने पर आईना सबको अपनी औकात दिखा देता है, कौन किसका है और कौन जातिवादी, ये चेहरा साफ़ दिखा देता है।
जातिवाद पर महापुरुषों की पंक्तियां
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान। संत कबीर
ऊंचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊंच न होय,
सुबरन कलश सुरा भरा, साधू निन्दै सोय। संत कबीर
कबीरा खड़ा बाज़ार में, लिए लुकाठी हाथ,
जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ। संत कबीर
जात-पात के फेर मंहि, उरझि रहई सब लोग,
मानुषता को खात है, रैदास जात का रोग। संत रैदास
रैदास जनम के कारनै, होत न कोउ नीच,
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच। संत रैदास
एक बूंद एकै मल मूत्र, एक चाम एक गूदा,
एक जोति थैं सब उत्पन्ना, कौन बामन कौन सूदा। संत कबीर
माटी का एक नाग बनाके, पुजे लोग लुगाया,
जिंदा नाग जब घर मे निकले, ले लाठी धमकाया। संत कबीर
जो तू बाभन, बाभनी जाया,
आन बाट व्है, क्यों न आया। संत कबीर
हिन्दू कहूँ तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं,
पाँच तत्व का पुतला, गैबी खेले माहिं। संत कबीर
प्रेम पंथ के हम पथिक, रंक हो या राव,
सबके लिए खुला हुआ, अपना यह दरबाव।
जातिवाद क्रांतिकारी शायरी और कविताएं
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में। अदम गोंडवी
भूख के अहसास को शेरों-सुखन तक ले चलो,
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो। अदम गोंडवी
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको,
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊबकर,
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूबकर। अदम गोंडवी
जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषण्ड,
मैं क्या जानूँ जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदंड। रामधारी सिंह दिनकर
ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले-के-काले,
शरमाते हैं नहीं जगत् में जाति पूछनेवाले। रामधारी सिंह दिनकर
सूतपुत्र हूँ मैं, लेकिन थे पिता पार्थ के कौन?
साहस हो तो कहो, ग्लानि से रह जाओ मत मौन। रामधारी सिंह दिनकर
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है? अदम गोंडवी
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़,
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये। अदम गोंडवी
जिसकी लाठी उसकी भैंस, ये कैसा कानून है,
गरीब की रगों में क्या, पानी है या खून है?
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर ने बांट लिया भगवान को,
धरती बांटी, सागर बांटा, मत बांटो इंसान को। गोपालदास नीरज
इंसानियत और भाईचारे पर बेहतरीन शेर
यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम कर दे। बशीर बद्र
तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा। साहिर लुधियानवी
सियासत की अपनी अलग इक जुबां है,
लिखा है जो गीता में, वो कब कुरान में है।
लहू हम सबका एक है, अलग है बस कबीला,
कोई हरा, कोई भगवा, तो कोई रंग है नीला।
नफरतों के शहर में, चालाकियों के डेरे हैं,
यहाँ वो लोग रहते हैं, जो तेरे हैं न मेरे हैं।
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा। इक़बाल
मेरी जाति पूछने वाले, बस इतना समझ ले,
जख्म तुझे भी दर्द देता है, जख्म मुझे भी दर्द देता है।
कोई तो बताए कि ये जाति का बंधन क्या है,
अगर खून लाल है सबका, तो ये अंतर क्या है।
बनाकर फकीरों का हम भेष गालिब,
तमाशा-ए-अहले करम देखते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब
गरीबों की बस्ती में जाकर तो देखो,
वहाँ बच्चे भूखे तो हैं, पर जातिवादी नहीं।
आधुनिक और सोशल मीडिया के चुनिंदा कोट्स
जाति का नशा जब उतरता है,
तब तक इंसानियत की चिता जल चुकी होती है।
कब्रिस्तान में जाकर देखा तो समझ आया,
कि इस मिटटी में मिलने के बाद कोई ब्राह्मण या दलित नहीं रहता, सब खाक हो जाते हैं।
अगर भगवान को जातियों में दिलचस्पी होती,
तो इंसान पैदा करते वक्त माथे पर ठप्पा लगाकर भेजते।
खून का कोई रंग नहीं होता,
और आंसुओं की कोई जात नहीं होती।
रोटी की कोई जात नहीं होती,
और भूख का कोई धर्म नहीं होता।
साहब, वो मेरी जाति पूछ रहे थे,
मैंने कह दिया 'गरीबी' है, वो खामोश हो गए।
नफरत फैलाने वाले क्या जाने,
कि शमशान की राख एक जैसी होती है।
शहर में मज़दूरों की बस्ती है जहाँ,
वहां जातियों का शोर नहीं होता।
जातियां इंसानों ने बनाई हैं, और इंसानियत भगवान ने;
चुनो तुम्हें किसका साथ देना है।
आरक्षण पर बहस करने वालों,
कभी उस कुएं का पानी पीकर देखो जहाँ सदियों तक किसी को जाने की इजाजत नहीं थी।
जातिवाद पर कुछ और अनमोल पंक्तियां
उजालों में मिल ही जाएगा कोई ना कोई,
तलाश उसकी करो जो अंधेरों में भी साथ दे।
फ़रिश्ते ही होंगे जिनका हुआ इश्क मुकम्मल,
इंसानों को तो हमने सिर्फ बर्बाद होते देखा है।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। बशीर बद्र
मेरे वजूद को तोलने वाले,
अपनी सोच का वजन तो कर ले।
इंसानियत ही मेरा धर्म है,
और प्यार मेरी जाति।
पत्थर के जिगर वालों, ग़म में वो रवानी है,
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है।
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। बशीर बद्र
मुझसे मेरी जात पूछने वाले,
पहले अपनी इंसानियत तो साबित कर।
न मैं गिरा, न मेरी उम्मीदों के मीनार गिरे,
पर कुछ लोग मुझे गिराने में कई बार गिरे।
सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से,
कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।
Conclusion
दोस्तों, ये थीं वो चुनिंदा पंक्तियां जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। जातिवाद सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक मानसिकता है जिसे हमें बदलना होगा। अगर आपको यह संकलन पसंद आया हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें ताकि इंसानियत का पैगाम दूर तक जा सके।