भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी: एक युगपुरुष
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के 'अजातशत्रु' (जिसका कोई शत्रु न हो) कहे जाते थे। वे एक महान राजनेता, प्रखर वक्ता, संवेदनशील कवि और भारत के तीन बार प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाकर विश्व पटल पर एक नई पहचान दी। यहाँ उनके जीवन का विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
- जन्म: 25 दिसंबर 1924 (ग्वालियर, मध्य प्रदेश)।
- पिता: पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी (एक स्कूल शिक्षक और कवि)।
- माता: कृष्णा देवी (घरेलू महिला)।
- परिवार: अटल जी 7 भाई-बहन थे। वे आजीवन अविवाहित रहे, लेकिन उन्होंने बी.एन. कौल की बेटी 'नमिता' को अपनी दत्तक पुत्री माना। नमिता और उनके पति रंजन भट्टाचार्य उनके साथ ही रहते थे।
2. शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
- स्कूली शिक्षा: उनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के सरस्वती शिशु मंदिर में हुई।
- उच्च शिक्षा: उन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज (अब लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातक किया। इसके बाद कानपुर के डी.ए.वी. कॉलेज से राजनीति विज्ञान में एम.ए. किया और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।
3. राजनीति में प्रवेश और संघ (RSS) से जुड़ाव
- RSS: छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवक बन गए थे। बाबा साहेब आप्टे से प्रभावित होकर उन्होंने 1947 में प्रचारक के रूप में कार्य करना शुरू किया।
- पत्रकारिता: राजनीति में आने से पहले उन्होंने राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य, और वीर अर्जुन जैसे पत्रों का संपादन किया।
- जनसंघ: 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
- संसदीय शुरुआत: 1957 में वे बलरामपुर (उत्तर प्रदेश) से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुँचे।
4. राजनीतिक संघर्ष और आपातकाल
- संसद में उनके भाषणों से प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इतने प्रभावित थे कि उन्होंने भविष्यवाणी की थी, "यह लड़का एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।"
- आपातकाल (1975): इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
- विदेश मंत्री (1977): जनता पार्टी की सरकार में वे विदेश मंत्री बने। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) में पहली बार हिंदी में भाषण देकर भारत का मान बढ़ाया।
- BJP की स्थापना: 1980 में उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर 'भारतीय जनता पार्टी' (BJP) की स्थापना की और इसके पहले अध्यक्ष बने।
5. प्रधानमंत्री के रूप में तीन कार्यकाल
- 1996: केवल 13 दिन के लिए (बहुमत साबित न कर पाने पर इस्तीफा दिया)।
- 1998-1999: 13 महीने के लिए (जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने पर सरकार 1 वोट से गिर गई)।
- 1999-2004: 5 साल का पूरा कार्यकाल (यह पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया)।
1 वोट से सरकार गिरने की राजनीती
अटल बिहारी वाजपेयी और जयललिता के बीच का वह घटनाक्रम भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे रोमांचक और नाटकीय अध्यायों में से एक है। 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार (NDA) को जयललिता की पार्टी AIADMK का समर्थन प्राप्त था, लेकिन दोनों के बीच लगातार वैचारिक और प्रशासनिक टकराव चलता रहा। जयललिता तत्कालीन द्रमुक (DMK) सरकार को बर्खास्त करने जैसी कई मांगें रख रही थीं, और ऐसा मानना है कि कुछ प्रशासनिक मुकदमों को वापस करने की मांग भी कर रही थी, जिन्हें अटल जी मानने को तैयार नहीं थे। अंततः अप्रैल 1999 में जयललिता ने राष्ट्रपति को अपना समर्थन वापसी का पत्र सौंप दिया, जिससे सरकार अल्पमत में आ गई और राष्ट्रपति ने अटल जी को सदन में अपना बहुमत साबित करने का निर्देश दिया।
17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हुई, जिसका परिणाम पूरे देश के लिए चौंकाने वाला था। वोटिंग के दौरान ओडिशा के तत्कालीन (2 महिने पहले) मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग, जो अभी सांसद भी थे और इस्तीफा नहीं दिया था, ने नियमों का लाभ उठाते हुए वोट दिया, जिससे वाजपेयी सरकार के खिलाफ 270 और पक्ष में 269 वोट पड़े। इस तरह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केवल 'एक वोट' के मामूली अंतर से गिर गई। सरकार गिरने के बावजूद अटल जी ने बड़े ही धैर्य और गरिमा के साथ इस्तीफा दिया, जिसके बाद हुए मध्यावधि चुनावों में वे भारी बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौटे और अपना कार्यकाल पूरा किया।
कांग्रेस की भूमिका
सच्चाई यह है कि कांग्रेस उस समय विपक्ष की मुख्य पार्टी थी और उसने अटल जी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) का पूरा समर्थन किया था।
सोनिया गांधी का रोल: जब जयललिता ने समर्थन वापस लिया, तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश की। उन्होंने राष्ट्रपति से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा भी पेश किया था और अपना प्रसिद्ध बयान दिया था— "हमारे पास 272 (सांसदों) का समर्थन है" (We have 272)। हालांकि, बाद में मुलायम सिंह यादव के समर्थन न देने के कारण वह सरकार नहीं बना सकीं और देश को चुनाव में जाना पड़ा।
गिरिधर गमांग का वोट: कांग्रेस के ही सांसद गिरिधर गमांग (जो उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री बन चुके थे) ने सदन में आकर सरकार के खिलाफ वोट दिया था। यदि वे वोट न देते या कांग्रेस उन्हें न बुलाती, तो शायद अटल जी की सरकार बच जाती।
DMK (द्रमुक) की विचारधारा: हिंदुत्ववादी या विरोधी?
DMK (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की विचारधारा को समझना थोड़ा पेचीदा है, क्योंकि यह समय के साथ बदलती रही है:
मूल विचारधारा (नास्तिकता और तर्कवाद): DMK की जड़ें 'पेरियार' (ई.वी. रामास्वामी) के 'आत्म-सम्मान आंदोलन' में हैं। पेरियार कट्टर हिंदू-विरोधी (विशेषकर ब्राह्मणवाद के विरोधी) और नास्तिक थे। इसी कारण DMK ऐतिहासिक रूप से खुद को धर्मनिरपेक्ष और तर्कवादी मानती रही है और कई बार हिंदू रीति-रिवाजों की आलोचना भी करती है।
रोचक बात यह है कि 1999 में जब जयललिता (AIADMK) ने अटल जी का साथ छोड़ा, तो यही DMK (करुणानिधि की पार्टी) अटल जी के साथ आ गई थी। 1999 से 2004 तक DMK, भाजपा के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन का हिस्सा रही।
आज के समय में DMK फिर से भाजपा और हिंदुत्व की राजनीति की प्रखर विरोधी है। वे 'द्रविड़ियन मॉडल' की बात करते हैं जिसे वे हिंदुत्व के विपरीत मानते हैं।
6. प्रमुख योगदान और ऐतिहासिक निर्णय
(क) पोखरण-2: परमाणु परीक्षण और अमेरिका का दबाव
मई 1998 में अटल जी ने वह फैसला लिया जिसने दुनिया को चौंका दिया।
- ऑपरेशन शक्ति: 11 और 13 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में 5 भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए।
- गोपनीयता: यह मिशन इतना गुप्त था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के जासूसी उपग्रह भी इसे पकड़ नहीं पाए। वैज्ञानिक सेना की वर्दी में वहां काम करते थे।
- अमेरिका का दबाव: अमेरिका ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने बहुत दबाव बनाया। लेकिन अटल जी झुके नहीं। उन्होंने नारा दिया— "जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान"। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।
(ख) राम मंदिर निर्माण में भूमिका
- राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान अटल जी भाजपा का 'उदारवादी चेहरा' (Moderate Face) थे, जबकि आडवाणी जी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
- हालांकि वे रथ यात्रा में सीधे शामिल नहीं थे, लेकिन उन्होंने वैचारिक रूप से इसका समर्थन किया।
- दिसंबर 2000 में उन्होंने संसद में कहा था, "राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय भावना का प्रकटीकरण है।"
(ग) करगिल युद्ध (1999)
- पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए वे 'सदा-ए-सरहद' बस लेकर लाहौर गए।
- लेकिन पाकिस्तान ने धोखा दिया और करगिल में घुसपैठ की। अटल जी ने 'ऑपरेशन विजय' को मंजूरी दी और भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटा दी। उन्होंने अमेरिका के दबाव में आकर युद्धविराम करने से मना कर दिया था जब तक कि घुसपैठिए खदेड़ न दिए जाएं।
(घ) आधारभूत ढांचा (Infrastructure)
- स्वर्णिम चतुर्भुज योजना (Golden Quadrilateral): दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली हाईवे परियोजना।
- प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना: गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ने की क्रांति।
7. अटल जी: एक कवि (रचनाएं व पंक्तियां)
अटल जी कहते थे, "मैं राजनेता होने से पहले एक कवि हूँ।" उनकी प्रसिद्ध रचनाएं 'मेरी इक्यावन कविताएं' में संकलित हैं।
प्रसिद्ध पंक्तियां:बाधाएं आती हैं आएं,
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पांवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा। अटल बिहारी वाजपेई
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ। अटल बिहारी वाजपेई
8. जीवन की रोचक बातें और किस्से
- खाने के शौकीन: ब्राह्मण होने के बावजूद अटल जी को मांसाहारी भोजन पसंद था। वे कभी कभी झींगा (Prawns) और मछली आदि खाते थे। लेकिन दैनिक जीवन में मांसाहारी भोजन बहुत कम करते थे।
- दोस्ती:राजनैतिक मतभेद के बावजूद उनकी विपक्ष के नेताओं से भी दोस्ती थी। जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और उन्हें पता चला कि अटल जी को किडनी की समस्या है, तो उन्होंने अटल जी को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका भेजने में मदद की ताकि उनका इलाज हो सके।
- कुंवारेपन पर जवाब: एक बार संसद में किसी ने उनसे पूछा कि आप अब तक कुंवारे क्यों हैं? तो उन्होंने हंसते हुए कहा, "आदर्श पत्नी की खोज में।" जब पूछा गया कि क्या वह मिली नहीं? तो बोले, "मिली थी, लेकिन वो भी आदर्श पति की खोज में थी।"
- 13 का संयोग: उनकी सरकार 13 दिन चली, फिर 13 महीने चली, 13 पार्टियों का गठबंधन था और परमाणु परीक्षण भी तारीख 13 को हुआ। 13 अंक उनके जीवन से जुड़ा रहा।
9. मृत्यु और विरासत
- बीमारी: 2009 में उन्हें स्ट्रोक आया, जिसके बाद वे डिमेंशिया से पीड़ित हो गए और धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए। वे कई सालों तक बिस्तर पर रहे और किसी को पहचान नहीं पाते थे।
- निधन: 16 अगस्त 2018 को एम्स (AIIMS), दिल्ली में 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
- समाधि: अटल बिहारी वाजपेयी जी का हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार दाह संस्कार (अंतिम संस्कार) किया गया था। 17 अगस्त 2018 को नई दिल्ली के 'राष्ट्रीय स्मृति स्थल' पर उनकी दत्तक पुत्री नमिता भट्टाचार्य ने उन्हें मुखाग्नि दी थी।
दाह संस्कार के बाद, जिस स्थान पर उनका अंतिम संस्कार हुआ था, वहीं उनकी समाधि बनाई गई है, जिसे 'सदैव अटल' नाम दिया गया है। यह समाधि उनके व्यक्तित्व की तरह ही भव्य और शांत है, जहाँ उनकी कविताओं की कुछ पंक्तियाँ भी अंकित हैं। - प्रतिमा:अटल बिहारी वाजपेयी जी की 25 फीट ऊंची भव्य कांस्य प्रतिमा लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के 'लोक भवन' परिसर में 25 दिसंबर 2019 को स्थापित की गई थी। इस प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल जी की 95वीं जयंती के शुभ अवसर पर किया था, जो उनके प्रति राष्ट्र के सम्मान का एक स्थायी प्रतीक है।
अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे नेता थे जिन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, लेकिन विरोधियों का भी हमेशा सम्मान किया। भारतीय राजनीति में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।