देवराज इन्द्र कृत महालक्ष्मी स्तुति | Indra Krit Mahalakshmi Stuti Lyrics in Hindi

क्या आप जानते हैं इन्द्र ने अपना खोया राजपाठ कैसे पाया? पढ़िए विष्णु पुराण वर्णित सम्पूर्ण 'इन्द्र कृत महालक्ष्मी स्तुति' हिंदी अर्थ और पाठ विधि सहित।
PUBLISHED BY MR. SANDHATA
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देवराज इन्द्र कृत श्री महालक्ष्मी स्तुति

सनातन धर्म में माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए कई स्तोत्र हैं, लेकिन इन्द्र कृत महालक्ष्मी स्तुति का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है। यह स्तुति न केवल धन प्रदान करती है, बल्कि व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और मान-सम्मान भी लाती है।


देवराज इन्द्र कृत महालक्ष्मी स्तुति | Indra Krit Mahalakshmi Stuti Lyrics in Hindi

प्रस्तावना एवं कारण

पौराणिक कथा के अनुसार, जब महर्षि दुर्वासा जी के शाप के कारण देवराज इन्द्र श्री-हीन हो गए और लक्ष्मी जी स्वर्ग छोड़कर समुद्र में विलीन हो गईं, तब स्वर्ग का ऐश्वर्य समाप्त हो गया। असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। तब देवताओं ने भगवान विष्णु की आज्ञा से 'समुद्र मंथन' किया। समुद्र मंथन से जब देवी महालक्ष्मी पुनः प्रकट हुईं, तब प्रसन्न होकर इन्द्र ने उनकी दिव्य स्तुति की। इस स्तुति से प्रसन्न होकर माँ लक्ष्मी ने इन्द्र को पुनः उनका राज्य और वैभव लौटा दिया।

स्त्रोत (Source): यह स्तुति विष्णु पुराण (प्रथम अंश, अध्याय 9) के श्लोक संख्या 117 से 133 तक वर्णित है।


॥ श्री महालक्ष्मी स्तुति (इन्द्रकृत) ॥

इन्द्र उवाच

नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्।
श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्॥१॥

त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनी।
सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ॥ २ ॥

यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने।
आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी॥ ३ ॥

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च।
सौम्या सौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद्देवि पूरितम्॥४॥

का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः।
अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः॥५॥

त्वयैतदाश्रितं विश्वं जगदेतच्चराचरम्।
परित्यक्ता च या देवि त्वया सा विप्रणश्यति॥६॥

त्वया विलोकिताः सद्यः शीलाद्यैः सकलैर्गुणैः।
कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि ॥७॥

स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान्।
स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः॥८॥

सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः।
पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे॥९॥

न ते वर्णयितुं शक्ता गुणाञ्जिह्वापि वेधसः।
प्रसीद देवि पद्माक्षि मास्मांस्त्याक्षीः कदाचन॥१०॥


स्तोत्र का हिंदी अर्थ

  1. समस्त लोकों की जननी, समुद्र से उत्पन्न, खिले कमल के समान नेत्रों वाली और भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली श्रीलक्ष्मी जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
  2. हे देवी! आप ही सिद्धि, स्वधा, स्वाहा और अमृत हैं। संध्या, रात्रि, प्रभा, ऐश्वर्य, मेधा, श्रद्धा और सरस्वती भी आप ही हैं।
  3. हे शोभने! आप ही यज्ञविद्या, महाविद्या, गुप्त विद्या और मोक्ष देने वाली आत्मविद्या हैं।
  4. तर्कविद्या, वेत्रयी, जीविका और राजनीति भी आप ही हैं। आपके ही सौम्य रूपों से यह जगत व्याप्त है।
  5. हे देवी! आपके बिना भगवान विष्णु के यज्ञमय शरीर में और कौन निवास कर सकता है?
  6. इस चराचर जगत को आप ही ने आश्रय दिया है। जिस मनुष्य या वस्तु को आप त्याग देती हैं, उसका सर्वनाश हो जाता है।
  7. आपकी कृपा दृष्टि से गुणहीन मनुष्य भी तुरंत शील, चरित्र और ऐश्वर्य से युक्त हो जाता है।
  8. जिस पर आपकी दृष्टि पड़ जाए, वही वास्तव में प्रशंसनीय, गुणी, धन्य, बुद्धिमान और शूरवीर है।
  9. हे विष्णुप्रिये! आप जिससे विमुख हो जाती हैं, उसके समस्त उत्तम गुण तुरंत दोषों में बदल जाते हैं।
  10. हे देवी! आपकी महिमा का वर्णन ब्रह्मा जी भी नहीं कर सकते। हे कमलनेत्री! मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे कभी न त्यागें।

सामान्य पाठ विधि

  • समय: इस स्तुति का पाठ सुबह या शाम के समय करना सबसे उत्तम माना गया है।
  • दिन: शुक्रवार को इस स्तुति का पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • शुद्धता: स्नान आदि से निवृत्त होकर, साफ वस्त्र पहनकर, घी का दीपक जलाकर माँ लक्ष्मी के सम्मुख इसका पाठ करें।
  • लाभ: इसके नित्य पाठ से आर्थिक तंगी दूर होती है, व्यापार में वृद्धि होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों पर आधारित है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया पाठ ही फलदायी होता है।