भज गोविन्दम् स्तोत्र (मोह मुद्गर) - हिंदी अर्थ सहित | आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'भज गोविन्दम्' (मोह मुद्गर) का सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित पढ़ें। जानें जीवन, मृत्यु और गोविंद भक्ति का वास्तविक मर्म।
PUBLISHED BY MR. SANDHATA
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भज गोविन्दम् (मोह मुद्गर) - परिचय व स्तोत्र

'भज गोविन्दम्' (Bhaja Govindam), जिसे 'मोह मुद्गर' (मोह को तोड़ने वाला हथौड़ा) भी कहा जाता है, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण स्तोत्रों में से एक है। इसमें वेदांत के गूढ़ दर्शन को अत्यंत सरल और संगीतमय भाषा में पिरोया गया है। यह रचना मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से जागने और ईश्वर (गोविंद) की भक्ति में मन लगाने की प्रेरणा देती है।

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'भज गोविन्दम्' (मोह मुद्गर) का सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित

रचना के पीछे की कहानी (प्रसंग)

कहा जाता है कि एक बार आदि शंकराचार्य काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने एक वृद्ध विद्वान को देखा, जो मृत्यु के अत्यंत निकट होने के बावजूद पाणिनी व्याकरण के सूत्रों (डुकृञ्करणे - Dukrun-karane) को रटने में मग्न था।

शंकराचार्य जी को उस वृद्ध पर दया आई। उन्होंने सोचा कि जीवन भर इस व्यक्ति ने पांडित्य और तर्क-वितर्क में समय बिताया, और अब अंत समय में भी ईश्वर को याद करने के बजाय वह शब्दों के जाल में फंसा है। उसी क्षण उनके मुख से यह 'भज गोविन्दम्' स्तोत्र फूटा, जिसमें उन्होंने समझाया कि अंततः केवल भक्ति ही काम आती है, कोरा ज्ञान या रटे हुए नियम नहीं।


सम्पूर्ण भज गोविन्दम् स्तोत्र (हिंदी अर्थ सहित)

मुख्य द्वादश मंजरिका (शंकराचार्य रचित)

1. भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढमते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले, नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥

अर्थ: हे मूर्ख! गोविंद का भजन कर, गोविंद का नाम ले। जब मृत्यु का समय आएगा, तब व्याकरण के नियम (डुकृञ्करणे) तेरी रक्षा नहीं करेंगे।

2. मूढ जहीहि धनागमतृष्णां, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम्॥

अर्थ: हे मूर्ख! धन जमा करने की प्यास त्याग दे। अपने मन में सद्बुद्धि ला और तृष्णा (लालच) से मुक्त हो जा। अपने कर्मों के अनुसार जो भी मिले, उसी में चित्त को प्रसन्न रख।

3. नारीस्तनभरनाभीदेशं, दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम्।
एतन्मांसवसादिविकारं, मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥

अर्थ: स्त्री के शरीर के आकर्षण में मत फंस। यह शरीर केवल मांस, मज्जा और वसा का विकार मात्र है—इस सत्य का बार-बार मन में विचार कर।

4. नलिनीदलगतजलमतितरलं, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकं शोकहतं च समस्तम्॥

अर्थ: जैसे कमल के पत्ते पर पड़ी पानी की बूंद अस्थिर होती है, वैसे ही यह जीवन अत्यंत चंचल है। समझ लो कि यह पूरा संसार रोग, अहंकार और शोक से ग्रस्त है।

5. यावद्वित्तोपार्जनसक्तः, तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥

अर्थ: जब तक तुम धन कमाने में सक्षम हो, तब तक ही परिवार के लोग तुमसे प्रेम करते हैं। जब शरीर बूढ़ा और जर्जर हो जाता है, तो घर में कोई बात भी नहीं पूछता।

6. यावत्पवनो निवसति देहे, तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥

अर्थ: जब तक शरीर में प्राण (सांस) हैं, तब तक ही लोग कुशल-मंगल पूछते हैं। प्राण निकलते ही शरीर गिर जाता है, और तब अपनी ही पत्नी उस शरीर (लाश) से डरने लगती है।

7. बालस्तावत्क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्लासक्तः, परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥

अर्थ: बचपन खेल में बीत गया, जवानी मोह-माया में बीत गई, और बुढ़ापा चिंताओं में बीत रहा है। परब्रह्म (ईश्वर) में किसी का मन नहीं लगा।

8. का ते कान्ता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं कः कुत आयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥

अर्थ: कौन तुम्हारी पत्नी है? कौन तुम्हारा पुत्र है? यह संसार बहुत विचित्र है। तुम किसके हो? कहां से आए हो? हे भाई! इस सत्य (तत्व) का विचार करो।

9. सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं, निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं, निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥

अर्थ: सत्संग से वैराग्य (आसक्ति का नाश) आता है। वैराग्य से मोह नष्ट होता है। मोह नष्ट होने से स्थिर तत्व (सत्य) की प्राप्ति होती है, और सत्य में स्थिर होने से ही जीवन-मुक्ति मिलती है।

10. वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥

अर्थ: आयु बीत जाने पर काम-वासना कैसी? पानी सूख जाने पर तालाब कैसा? धन चले जाने पर परिवार (पीछे चलने वाले) कैसा? और आत्म-ज्ञान हो जाने पर संसार (का बंधन) कैसा?

11. मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वम्।
मायामयमिदमखिलं हित्वा, ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥

अर्थ: धन, जन (शक्ति) और जवानी का घमंड मत कर। काल (समय) पल भर में इन सबको हर लेता है। इस पूरी मायावी दुनिया को त्याग कर, ब्रह्म (ईश्वर) को जानकर उसमें प्रवेश कर।

12. दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः, तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥

अर्थ: दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते हैं। काल खेल रहा है, आयु बीत रही है, फिर भी इंसान 'आशा' (इच्छाओं) की वायु को नहीं छोड़ता।

चतुर्दश मंजरिका (शिष्यों द्वारा रचित)

13. का ते कान्ता धनगतचिन्ता, वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।
त्रिजगति सज्जनसंगतिरेका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥

अर्थ: पत्नी और धन की चिंता क्यों करते हो? हे पागल! क्या तुम्हारा कोई नियन्ता (ईश्वर) नहीं है? तीनों लोकों में केवल सज्जनों की संगति ही इस संसार रूपी सागर को पार करने की नौका है।

14. जटिलो मुण्डी लुञ्चितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥

अर्थ: कोई जटा बढ़ा लेता है, कोई सिर मुंडा लेता है, कोई बाल नोच लेता है, तो कोई भगवा वस्त्र पहन लेता है। ये सब पेट भरने (जीविका) के लिए किए गए वेष हैं। सत्य सामने होकर भी ये मूर्ख उसे नहीं देख पाते।

15. अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥

अर्थ: अंग गल गए हैं, सिर के बाल सफेद हो गए हैं, मुंह में दांत नहीं रहे, बूढ़ा आदमी लाठी लेकर चलता है, फिर भी वह आशा (मोह) की पोटली नहीं छोड़ता।

16. अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः, रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।
करतलभिक्ष-स्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥

अर्थ: आगे आग जल रही है, पीछे सूरज की धूप है, रात में घुटनों में सिर छिपाकर सोता है, हाथ में भिक्षा का अन्न और पेड़ के नीचे निवास है—इतना सब होने पर भी इच्छाओं का बंधन नहीं छूटता।

17. कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन, भजति न मुक्तिं जन्मशतेन॥

अर्थ: चाहे कोई गंगा-सागर की तीर्थयात्रा करे, व्रत का पालन करे या दान दे; यदि ज्ञान नहीं है, तो सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिल सकती।

18. सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः, शय्या भूतलमजिनं वासः।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः॥

अर्थ: देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, जमीन पर बिस्तर, मृगछाला का वस्त्र और सभी भोग-विलास का त्याग—ऐसा वैराग्य किसे सुखी नहीं करता?

19. योगरतो वा भोगरतो वा, सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥

अर्थ: कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में हो या अकेले में—जिसका मन 'ब्रह्म' में रम गया है, बस वही आनंद करता है।

20. भगवद्गीता किञ्चिदधीता, गङ्गाजललवकणिका पीता।
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥

अर्थ: जिसने थोड़ी सी भी भगवद्गीता पढ़ी है, गंगाजल की एक बूंद भी पी है, और एक बार भी भगवान कृष्ण की पूजा की है—यमराज भी उससे चर्चा नहीं करते।

21. पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननीजठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥

अर्थ: बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना, और बार-बार माँ के गर्भ में सोना। यह संसार पार करना बहुत कठिन है। हे मुरारी! अपनी अपार कृपा से मेरा उद्धार करो।

22. रथ्यार्पटविरचितकन्थः, पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः।
योगी योगनियोजितचित्तो, रमते बालोन्मत्तवदेव॥

अर्थ: जो गली में पड़े चिथड़ों की गुदड़ी पहनता है, जो पाप और पुण्य से ऊपर उठ चुका है, जिसका चित्त योग में लगा है—ऐसा योगी बालक या पागल की तरह मस्त होकर आनंद में रहता है।

23. कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारं, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम्॥

अर्थ: तुम कौन हो? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? कौन मेरी माँ है, कौन पिता है? इस पूरे संसार को असार और एक सपने जैसा समझकर इन प्रश्नों पर विचार करो।

24. त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः, व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥

अर्थ: मुझमें, तुममें और अन्य सभी जगह एक ही विष्णु (परमात्मा) व्याप्त हैं। तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो। यदि तुम मोक्ष चाहते हो, तो सब जगह सम-चित्त (समान भाव) रखो।

25. शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥

अर्थ: शत्रु, मित्र, पुत्र या भाई-बंधु से न तो झगड़ा करो और न ही संधि का प्रयास (आसक्ति)। सबमें अपनी ही आत्मा को देखो और भेद-भाव वाले अज्ञान को छोड़ दो।

26. कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वात्मानं पश्यति सोऽहम्।
आत्मज्ञानविहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥

अर्थ: काम, क्रोध, लोभ और मोह को त्यागकर, स्वयं में "सोऽहम्" (वह मैं हूँ) का दर्शन करो। जो आत्म-ज्ञान से हीन हैं, वे मूर्ख नरक की यातना सहते हैं।

उपसंहार और फलश्रुति

27. गेयं गीता नामसहस्रं, ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।
नेयं सज्जनसङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम्॥

अर्थ: गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए। लक्ष्मीपति (विष्णु) के रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए। मन को सज्जनों के संग में लगाना चाहिए और गरीबों को धन दान देना चाहिए।

28. सुखतः क्रियते रामाभोगः, पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥

अर्थ: सुख के लिए लोग भोग करते हैं, जिसके बाद शरीर में रोग हो जाते हैं। यद्यपि अंत में मरना ही है, फिर भी लोग पाप करना नहीं छोड़ते।

29. अर्थमनर्थं भावय नित्यं, नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।
पुत्रादपि धनभाजां भीतिः, सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥

अर्थ: धन को सदा 'अनर्थ' ही समझो, उसमें लेशमात्र भी सुख नहीं है, यह सत्य है। धनवानों को अपने पुत्र से भी डर लगता है—दुनिया में यही रीति देखी गई है।

30. प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्यविवेकविचारम्।
जाप्यसमेतसमाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम्॥

अर्थ: प्राणायाम, इंद्रिय नियंत्रण, विवेक (क्या सही है, क्या गलत), और जाप के साथ समाधि—इन सबका बड़े ध्यान से पालन करो।

31. गुरुचरणाम्बुजनिर्भरभक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः।
सेन्द्रियमानसनियमादेवं, द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम्॥

अर्थ: गुरु के चरण-कमलों में पूर्ण भक्ति रखो, इससे तुम शीघ्र ही संसार से मुक्त हो जाओगे। अपनी इंद्रियों और मन को नियंत्रित करके तुम अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन कर पाओगे।