डिजिटल दौर की मज़ाहिया शायरी
आज का दौर इंटरनेट और मोबाइल का है, और अब इश्क़ भी पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। दिल टूटने की आह भी अब ईमेल में जाती है, और चिलमन की जगह ले चुका है स्काइप। मोहब्बत के पुराने एहसासात जब नए ज़माने की टेक्नोलॉजी से टकराते हैं, तो जो तस्वीर बनती है, वह है हँसी से लोटपोट कर देने वाली यह शानदार शायरी।
"नेट ईजाद हुआ हिज्र के मारों के लिए..." से शुरू होकर "तू नहीं तो और सही..." तक, यह नज़्म न सिर्फ़ ऑनलाइन इश्क़ की हक़ीक़त बयान करती है, बल्कि उस तन्हाई, सर्च इंजन मोहब्बत और फेसबुक मोहब्बत को भी उजागर करती है, जिसमें आज की पीढ़ी उलझी हुई है।
अगर आप भी कभी डिजिटल प्यार में पड़े हैं या इंटरनेट इश्क़ का शिकार हुए हैं, तो यह शायरी ज़रूर पढ़िए — हँसी भी आएगी और कुछ यादें भी ताज़ा होंगी।
नेट ईजाद हुआ हिज्र के मारों के लिए।
सर्च इंजन है बड़ी चीज़ कुँवारों के लिए।।
जिसको सदमा शब-ए-तन्हाई के अय्याम का है।
ऐसे आशिक़ के लिए नेट बहुत काम का है।।
नेट फ़रहाद को शीरीं से मिला देता है।
इश्क़ इंसान को गूगल पे बिठा देता है।।
काम मक्तूब का माउस से लिया जाता है।
आह-ए-सोज़ाँ को भी अपलोड किया जाता है।।
टेक्स्ट में लोग मोहब्बत की ख़ता भेजते हैं।
घर बताते नहीं ऑफ़िस का पता भेजते हैं।।
आशिक़ों का ये नया तौर नया टाइप है।
पहले चिलमन हुआ करती थी अब इस्काइप है।।
इश्क़ कहते हैं जिसे इक नया समझौता है।
पहले दिल मिलते थे अब नाम क्लिक होता है।।
दिल का पैग़ाम जब ईमेल से मिल जाता है।
मेल हर चौक पे फ़ीमेल से मिल जाता है।।
इश्क़ का नाम फ़क़त आह-ओ-फ़ुग़ाँ था पहले।
डाकख़ाने में ये आराम कहाँ था पहले।।
आई-डी जबसे मिली है मुझे हम-साई की।
अच्छी लगती है तवालत शब-ए-तन्हाई की।।
नेट पे लोग जो नव्वे से पलस होते हैं।
बैठे रहते हैं वो टस होते हैं न मस होते हैं।।
फेसबुक कूचा-ए-जानाँ से है मिलती-जुलती।
हर हसीना यहाँ मिल जाएगी हिलती-जुलती।।
ये मोबाइल किसी आशिक़ ने बनाया होगा।
उसको महबूब के अब्बा ने सताया होगा।।
टेक्स्ट जब आशिक़-ए-बर्क़ी का अटक जाता है।
तालिब-ए-शौक़ तो सूली पे लटक जाता है।।
ऑनलाइन तिरे आशिक़ का यही तौर सही।
तू नहीं कोई और सही,
कोई और नहीं तो कोई और सही।।