Knowledgeable Life Quotes
मनुष्य को यह अवश्य मानना चाहिए कि; बाल्यावस्था के विशुद्ध अंतःकरण में अच्छे संस्कारों को आसानी से उत्पन्न किया जा सकता है। अतः स्वयं को संभालने के साथ-साथ अपने अबोध बालक - बालिकाओं को अवश्य ही पवित्र जीवन यापन की कला में पारंगत कराइए।
आज के समय यह शिक्षा किसी भी स्कूल या कॉलेज में प्राप्त नहीं होगी। यह शिक्षा मां की ममता भरी गोद में तथा पिता की ज्ञानवर्धक उपदेश आदेश और अनुशासन युक्त जीवन में ही बालक प्राप्त कर सकते हैं।
माता-पिता का यह पुनीत कर्तव्य है कि अपने बालकों को खाने-कमाने की आधुनिक विद्या के साथ-साथ संस्कारों की शिक्षा भी अवश्य देते रहें। ये अनमोल वचन निम्नलिखित हैं-
1. तिरस्कृत होने पर भी धैर्य संपन्न सज्जन व्यक्ति के गुण आंदोलित नहीं होते, जैसे दुष्ट के द्वारा नीचे कर दी गई अग्नि कभी नीचे नहीं जाती।
2. वीर पुरुष शत्रु पक्ष की भयंकर गर्जना सहन नहीं कर सकता।
3. यदि सज्जन मनुष्य दुर्भाग्यवश कदाचित वैभव रहित हो जाता है, तो भी वह न तो दुष्ट जनों की सेवा व सहारा लेता है, जैसे भूख से अत्यंत पीड़ित होने पर भी सिंह घास नहीं खाता।
4. मित्र में अपने प्रति एक बार भी दुष्ट भाव परिलक्षित हो जाने पर उसे त्याग देना चाहिए। अल्प वार्तालाप ही मित्र के लिए है दण्ड है।
5. शत्रु की मृदुभाषी संतानों की उपेक्षा करना, विद्वान जनों के लिए उचित नहीं है; अर्थात प्रिय बोलने वाले शत्रु पुत्रों से भी सावधान रहना चाहिए।
6. उपकार के द्वारा वशीभूत हुए शत्रु से अन्य शत्रु को समूल उखाड़ फेंकना चाहिए क्योंकि पैर में गड़े हुए कांटे को मनुष्य हाथ में लिए हुए कांटो से ही निकालता है।
7. सज्जन व्यक्ति को अपकार परायण मनुष्य के नाश की चिंता कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह नदी के तट पर अवस्थित वृक्षों की भांति स्वयं ही नष्ट हो जाएगा।
8. धनार्जन करते समय, किसी भी प्रकार का प्रयोग करते समय, अपने कार्य को सिद्ध करते समय, भोजन के समय और सांसारिक व्यवहार के समय मनुष्य को लज्जा का परित्याग कर देना चाहिए।
9. एक ही व्यक्ति में सभी ज्ञान प्रतिष्ठित रूप में नहीं रहते। इस संसार में न तो कोई सर्वविद् है और न कोई अत्यंत मूर्ख ही है।
10. जो मनुष्य पराई स्त्रियों में मातृ भाव रखता है, जो दूसरों के द्रव्य को मिट्टी पत्थर के ढेले समझता है, सभी प्राणियों में आत्मदर्शन करता है, वही विद्वान है।
11. जिसके पास धन है, उसी के मित्र एंव बन्धु - बांधव है।
12. धैर्यवान पुरुष कष्ट पाकर भी दुखी नहीं होते, क्योंकि राहु के मुख में प्रविष्ट होकर चंद्र क्या पुनः उदित नहीं होता।
13. उद्योग करने पर यदि व्यक्ति को कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होती है तो उसमें भाग्य ही कारण है, तथापि मनुष्य को सदा पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।
14. दुर्जनों के साथ विवाद और मैत्री कुछ भी न करें तो अच्छा होगा।
15. सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहण आदि समयों मे मंत्र का जप, तपस्या, तीर्थ सेवन, देवार्चन, ब्राह्मण पूजन - ये सभी कृत्य भी महापातकों को भी नष्ट करने वाले होते हैं।
16. पंडित, विनीत, धर्मज्ञ एवं सत्यवादी जनों के साथ बंधन में भी रहना श्रेयस्कर है, किंतु दुष्टों के साथ राज्य का भी उपभोग करना उचित नहीं है।
17. कोई भी काम अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए।
18. जो व्यक्ति जितेंद्रिय होकर अनिंदित कर्मों में प्रवृत्त हो सन्मार्ग की ओर बढ़ता जाता है, उस विषयवासनाओं से दूर निवृत मार्ग वाले के लिये उसका घर तपोवन हैं।
19. सत्य के पालन से धर्म की रक्षा होती है। सदा अभ्यास करने से विद्या की रक्षा होती है। मार्जन के द्वारा पात्र की रक्षा होती है और शील से कुल की रक्षा होती।
20. अपने पक्ष के आत्मीय जन से 'थोड़ा धन मुझे दे दो' इस प्रकार याचना करना अच्छा नहीं है।
21. भाग्य का ह्रास होने से मनुष्य की संपदाओं का विनाश हो जाता है, न कि उपभोग करने से।
22. इस संसार में ऐसा कोई भी नहीं है, जिसको भाग्य के वशीभूत होने के कारण कर्म रेखा नहीं घुमाती।
23. राजा बलि उत्कृष्ट कोटि के दाता थे, विशिष्ट ब्राह्मणों के समक्ष पृथ्वी का दान दिया गया, फिर भी दान का फल बंधन प्राप्त हुआ। यह सब दैव का खेल है।
24. पूर्वजन्म में प्राणी ने जैसा कर्म किया है, उसी के अनुसार वह दूसरे जन्म में फल भोगता है। अतः स्वयमेव प्राणी अपने भाग्य फल का निर्माण करता है।
25. न पिता के कर्म से पुत्र को सद्गति मिल सकती है, और न पुत्र के कर्म से पिता को सद्गति मिल सकती है। सभी लोग अपने - अपने कर्म से ही अच्छी गति प्राप्त करते हैं।
26. पूर्व जन्म में अर्जित कर्म फल के अनुसार प्राप्त शरीर में शारीरिक व मानसिक रोग आकर अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं।
27. बाल, युवा, तथा वृद्ध जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, वह जन्म जन्मांतर में उसी अवस्था में उस कर्म फल का भोग करता है।
28. मनुष्य अपने प्रारब्ध का फल प्राप्त करता है। देवता भी उस फल भोग को रोकने में समर्थ नहीं है।
29. सभी प्रकार की सूचिताओं में अन्न की सूचिता प्रधान है। इनके अपवित्र रहने पर केवल मिट्टी व जल से शुचिता नहीं आती।
30. विद्वान, मधुरभाषी भी कोई व्यक्ति यदि दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचन को सुनकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता।
31. समय प्राप्त ना होने से पहले प्राणी सैकड़ों बाण लगने पर भी नहीं मरता और समय के आ जाने पर कुशा की नोक लग जाने से वह जीवित नहीं बचता।
32. अपने कर्म से प्रेरित होकर प्राणी स्वयं ही उन - उन स्थानों पर पहुंच जाता है।
33. नीच व्यक्ति दूसरे में सरसों के बराबर भी स्थित दोष छिद्रों को देखता है किंतु अपने बेल के समान अवस्थित दोष को नहीं देखता।
34. संक्षेप में, पराधीनता ही दु:ख है और स्वाधीनता ही सुख है।
35. प्राणी को सुख भोग के पश्चात दु:ख है, व दु:ख भोग के पश्चात सुख प्राप्त होता है।
36. जो मनुष्य वर्तमान में अनासक्त भाव से रहता है, वह किसी भी प्रकार के शोक से दुखी नहीं होता है।
37. यदि मनुष्य किसी के साथ शाश्वत प्रेम करना चाहता है तो उसके साथ धूत और धन का लेनदेन बंद कर देना चाहिए।
38. माता, बहिन अथवा पुत्री के साथ एकांत में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इंद्रियों का समूह बलवान होता है, वह विद्वान को भी दूराचरण की ओर खींच लेता है।
39. जो विनम्र भाव से सज्जन पुरुष को, धन से स्त्री को, तपस्या से देवता को, और सद्व्यवहार से समस्त लोक को वश में कर लेता है, वही पंडित है।
40. अधिक मात्रा में जल का पीना, गरिष्ठ भोजन, धातु की क्षीणता, मल-मूत्र का वेग रोकना, दिन में सोना, रात में जागना - इन छ: कारणों से शरीर में रोग निवास करने लगते हैं।
41. प्रातः कालीन धूप, अतिशय मैथुन, श्मशान के धूप का सेवन, श्मशान के अग्नि में हाथ सेंकना- दीर्घ आयु का विनाश करते हैं।
42. वृद्धा स्त्री, रात्रि में दही का प्रयोग, प्रभात काल में मैथुन एवं प्रातः कालीन निद्रा - ये प्राण विनाशक होते हैं।
43. ताजा घी, द्राक्षा फल, बाला स्त्री, दूग्ध सेवन, गरम जल तथा वृक्षों की छाया ये शीघ्र ही प्राण शक्ति प्रदान करने वाले हैं।
44. तैल मर्दन और सुंदर भोजन की प्राप्ति, ये सद्य शरीर में शक्ति का संचार करते हैं।
45. जो मलिन वस्त्र धारण करता है, दांतो को स्वच्छ नहीं रखता, अधिक भोजन करने वाला, कठोर वचन बोलने वाले हैं, उसे लक्ष्मी छोड़ देती है।
46. जो मनुष्य नख से तृण छेदन करता है, पृथ्वी पर लिखता है, नग्न शयन करता है, तो उसे लक्ष्मी जी त्याग देती हैं।
47. जो पुरुष अपने सिर को जल से धोकर स्वच्छ रखता है, चरणों को प्रछालित करके मल रहित करता है, वेश्या से दूर रहता है, अल्प भोजन करता है।
48. बाल सूर्य के तेज, जलती हुई चिता का धुॅंआ, वृद्ध स्त्री, बासी दही और झाड़ू की धूली का सेवन; दीर्घायु को नष्ट करते हैं।
49. हाथी, अश्व, रथ, गौ की धूलि, पुत्र की अंग में लगी हुई धुलि, महान कल्याणकारी एवं महा पातकों का विनाश है।
50. गधा, ऊंट, बकरी, भेड़ की धूलि अशुभ होती है।
51. सुप फटकने से निकली हुई वायु, नाखून का जल, स्नान किए हुए वस्त्र से निचोड़ा हुआ जल मनुष्य के पूर्वजन्मार्जित पुण्य को नष्ट कर देती है।
52. ब्राह्मण तथा अग्नि के बीच से, पति-पत्नी के बीच से, घोड़ा व साड़ के बीच से कभी नहीं जाना चाहिए।
53. प्राणी को अत्यंत सरल व अत्यंत कठोर नहीं होना चाहिए।
54. सज्जन पुरुष के आगे पीछे संपदाएं सर्वदा घूमती रहती है।
55. छ: कानों तक पहुंची हुई गुप्त मंत्रणा नष्ट हो जाती है। अतः मंत्रणा को चार कानों तक ही सीमित करना चाहिए।
56. एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन धीमता।
कुलं पुरुषसिंहेन चन्द्रेण गगनं यथा।।
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिता।
वनं सुवासितं सर्वसुपुत्रेण कुलं यथा।।
57. मनुष्य को 5 वर्ष तक पुत्र का प्यार से पालन करना चाहिए, 10 वर्ष तक उसे अनुशासित रखना चाहिए तथा 16 वर्ष की अवस्था में उसके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।
58. कम शक्तिशाली वस्तुओं का संगठन भी शक्ति संपन्न हो जाता है।
59. मनुष्य को भूलकर भी दुष्ट एवं छोटे शत्रु की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
60. मनुष्य को गुणहीन पत्नी, दुष्ट मित्र, कुपुत्र और कुत्सित देश का परित्याग दूर से ही कर देना चाहिए।
61. क्रोध से तपस्या नष्ट हो जाती है।
62. दुलार में बहुत से दोष हैं और ताड़ना में बहुत से गुण हैं, अत: शिष्य एवं पुत्र को अनुशासित रखना चाहिए।
63. आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु- ये 5 जन्म से सुनिश्चित रहते हैं।
64. निर्बल का बल राजा, बालक का बल रोना और मूर्खों का बल मौन रहना है।
65. लोभ, प्रमाद और विश्वास; व्यक्ति के विनाश के कारण हैं।
66. मनुष्य को भय के उपस्थित हो जाने पर उससे निर्भीक होकर सामना करना चाहिए।
67. ऋण, अग्नि तथा व्याधि के शेष रहने पर वे बार-बार बढ़ते है।
68. कौमार्य अवस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है।
69. अर्थ के लिए आतुर मनुष्य का न कोई मित्र है, न कोई बंधु।
70. मुख की विकृति, स्वर भंग, दैन्य भाव, पसीने से लथपथ शरीर; प्राणी में मृत्यु के समय उपस्थित होते हैं।
71. अरे! यदि मांगना हो तो ईश्वर से मांगो, वही तो एकमात्र अपना है।
72. स्वाध्याय, ध्यान एवं जप के सहारे बैराग्य, ज्ञान, भक्ति को सुदृढ़ करके दिव्य परमानंद पथ पर आगे बढ़ना है।
73. भव सागर से पार होने के लिए परमात्मा की प्राप्ति का दृढ़ पुरुषार्थ करो।
74. ईश्वर प्राप्ति में यदि तुम्हारा प्रथम प्रयास निष्फल हो, तो अधिर न हो जाओ, निरंतर प्रयास करते रहो।
75. ईश्वर कृपााभिलाषी मानव को प्रतिदिन प्रातः काल नियमपूर्वक प्रभु की उपासना की आदत दृढ़ करनी चाहिए।
76. भाव बिना बाजार की, वस्तु मिलें नहीं मोल।
भाव बिना हरि क्यों मिलें, भाव सहित हरि बोल।।
77. संक्रांति, अमावस्या, द्वादशी, पूर्णिमा, रविवार और सायंकाल के समय तुलसी पत्र नहीं तोड़ना चाहिए।
78. अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका और द्वारका यह सात पुरियाॅं मोक्ष देने वाली है।
79. जो मनुष्य मृत्यु के समय एक बार 'हरि' इस दो अक्षर का उच्चारण कर लेता है, वह मोक्ष का अधिकारी है।
80. जो मनुष्य प्रतिदिन 'कृष्ण' का स्मरण करता है उसे प्रभु मुक्त कर देते हैं।
81. तुलसी का वृक्ष लगाने और गुणगान करने से पूर्व जन्म अर्जित पाप नष्ट हो जाते हैं।
82. देवता प्राणी के भाव में विराजमान रहते हैं, इसीलिए सद्भाव से युक्त भक्ति का आचरण करना चाहिए।
83. मनुष्य के चित्त में जैसा विश्वास होता है वैसा ही उन्हें अपने कर्मों का फल प्राप्त होता है।
84. जो निराहार व्रत के द्वारा मृत्यु प्राप्त करता है, उसे भी मुक्ति प्राप्त होती है।
85. वापी, कूप, जलाशय, उद्यान एवं देवालयों का जीर्णोद्धार करने वाला दुगुना पुण्य प्राप्त करता है।
86. निर्जन प्रदेश में स्थित शिवलिंग का पूजन करोड़ों यज्ञों का फल प्रदान करता है।
87. जिस कार्य को तुरंत आरंभ कर देना चाहिए, उस के संदर्भ में उद्योग हीन होकर नहीं बैठना चाहिए।
88. सत्संग और विवेक- ये दो प्राणी के स्वस्थ नेत्र हैं।
89. शास्त्र अनेक है किंतु आयु बहुत ही कम है, इसीलिए सार-तत्व को ग्रहण करना चाहिए।
90. बंधन और मोक्ष के लिए इस संसार में दो ही पद है- 'यह मेरा है' और 'यह मेरा नहीं है'।
91. दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु की शरण में जाना चाहिए।
92. मार्ग में विद्यमान वृक्ष की छाया में मल-मूत्र का परित्याग न करें।
93. मनुष्य को प्रातः काल अवश्य ही दंत धवन (दातुन) करना चाहिए। कड़ुवे, तीते, कसैले काष्ठ के वृक्ष धन-धान्य और आरोग्य प्रदान करते हैं।
94. अमावस्या तिथि, नवमी, प्रतिपदा तथा रविवार के दिन दातुन नहीं करना चाहिए।
95. दातुन के न होने पर बारह कुल्ला जल के द्वारा मुख को पवित्र कर लेना चाहिए।
96. शौच के पश्चात हाथ-पैर साफ करने के लिए देवगृह या श्मशान की मिट्टी का उपयोग न करें।
97. प्रातः काल का स्नान शरीर की शुद्धि का हेतु और सौभाग्य की वृद्धि करने वाला है।
98. शरीर के नौ छिद्रों से मल निकलता रहता है, अतः स्नान अनिवार्य है।
99. विद्वान व्यक्ति को ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रति पृथक भाव नहीं रखना चाहिए।
100. माता-पिता, गुरु, अतिथि और अग्नि का पालन-पोषण प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए।
101. जेष्ठमास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि में स्नान पापों को भस्म कर देता है।