जानिए गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन की कुछ अनसुनी बातें

गोस्वामी तुलसीदास जी का सामान्य जीवन परिचय:

गोस्वामी तुलसीदास भारतीय संस्कृति के महान कवि थे जिनका जन्म 1532 ईसा पूर्व में उत्तर प्रदेश के जनपद बांदवगढ़, जो अब चित्रकूट जनपद के अंतर्गत आता है, में हुआ था। उनके पिता तरका नामक ब्राह्मण थे। तुलसीदास जी को उनके महान और प्रसिद्ध भाषा-शैली के कारण वाल्मीकि के बाद दूसरा आदिकवि कहा जाता है। उनके वास्तविक नाम रमेश्वर राय था, लेकिन उनके भगवान राम के भक्ति में खो जाने के कारण उन्हें तुलसीदास के नाम से प्रसिद्ध किया गया। तुलसीदास की रचनाएँ हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हिस्से में आती हैं, और उनके काव्य और साहित्य ने लोगों को उन्नति की राह दिखाई है।

पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।

तुलसीदास जी का जीवन पूर्वाश्रम में उन्हें गोस्वामी ज्ञानिन्द्र मन्दन नाम से जाना जाता था। उनके जीवन का एक अहम पल उनके 18 वर्षीय होते ही निजी जीवन से भगवद्भक्ति में लीन होना था। इसके पश्चात उन्होंने संत गोस्वामी रामानंद से गुरुकुली शिक्षा प्राप्त की और उनके उपदेश से तुलसीदास भक्ति और श्रेष्ठतम जीवन जीने के लिए प्रेरित हुए।

तुलसीदास जी का महत्वपूर्ण योगदान उनकी रचना "रामचरितमानस" की है। यह ग्रंथ मुख्य रूप से अवधी भाषा में लिखी गई है, जिसमें हिन्दी, संस्कृत का भी बहुत अच्छा संयोग है, और हिंदी भाषा के सबसे महत्वपूर्ण काव्यों में से एक माना जाता है। "रामचरितमानस" में भगवान राम के जीवन के कई घटनाओं को सुंदर रूप से वर्णित किया गया है और यह रचना भक्ति, संस्कृति, नैतिकता और धार्मिकता के प्रतीक बन गई है। इस काव्य में भगवान राम के जीवन के अनेक पहलू, उनके संघर्ष, धर्म और नैतिकता के मूल्य विचारों को संक्षेप में वर्णित किया गया है। रामचरितमानस के बारे में कहा जाता है कि यह एक सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली और प्रसिद्ध काव्यिक रचना है जो भारतीय साहित्य में विशेष माना जाता है।

तुलसीदास जी की और एक महत्वपूर्ण रचना "विनय पत्रिका" है, जिसमें उन्होंने श्रीराम को पत्र लिखकर अपने अनुराग भाव को प्रकट किया है। इसके अलावा, उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं जैसे "कवितावली," "जानकी मंगल," "बाल काण्ड," "उत्तर काण्ड," "लवकुश कांड," आदि।

तुलसीदास जी के जीवन का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनके सामाजिक सुधार के प्रति उनकी संवेदनशीलता रही। उन्होंने जाति भेदभाव का विरोध किया और समाज में सभी को समान दर्जा देने के लिए आवाज उठाई।

तुलसीदास जी के विचारधारा और उनके शृंगार-भक्ति की कविताओं में एक अद्भुत समन्वय था, जिससे उन्होंने लोगों के दिलों को छू लिया। उनके ग्रंथ आज भी संस्कृति और भक्ति के स्रोत के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय हैं और उनकी कविताएं भाषा, संगीत, और धर्म के मध्य एक अनमोल धरोहर के रूप में जीवित हैं। तुलसीदास जी के योगदान को सदैव स्मरण किया जाएगा और उन्हें भारतीय साहित्य का गर्व माना जाएगा।

तुलसीदास के अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ भगवान शिव की महिमा पर आधारित "विनय पत्रिका", भक्ति और नैतिकता को बयां करने वाली "दोहावली", और प्रेम और भक्ति के विचारों को संबोधित करने वाली "कृतिका" शामिल हैं। इन रचनाओं ने लोगों के चित्त में भक्ति और सद्भावना की भावना को जागृत किया।

तुलसीदास के जीवन के बारे में जानकारी अधिक नहीं है, और इसके बारे में कई किंवदंतियाँ भी मिलती हैं। विद्वानों के मुताबिक, उनका निधन सन् 1623 ईसा पूर्व हुआ था। तुलसीदास के योगदान से हिंदी भाषा को उन्नति मिली, और उनके काव्य का प्रभाव आज भी हिंदी साहित्य में दिखाई देता है। उनके भक्ति और काव्य को याद करके हम उन्हें एक महान और प्रेरणादायक कवि के रूप में स्मरण करते हैं।

श्रीरामचरितमानस की रचना कब हुई:

जब भारत पर मुगल शासक अकबर का शासन था, उस समय श्रीरामचरितमानस की रचना की गई। इस श्रीरामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, जो अनेक भाषाओं के जानकार और अयोध्या में ही रहकर उस समय की स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई किए थे। इस महाकाव्य का निर्माण 76 साल की उम्र में उन्होंने किया था। श्रीरामचरितमानस भारतीय संस्कृति में अपना एक विशेष स्थान रखता है और श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता हिन्दू समाज में अद्वितीय है। 

श्रीरामचरितमानस पर हुए विवाद: 

जब गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना की, तो श्रीरामचरितमानस पर जमकर बवाल हुआ क्योंकि हिंदू धर्म के सभी ग्रंथ संस्कृत में थे और तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ की रचना सरल और सुबोध अवधी भाषा में किया जिसमें इन्होंने संस्कृत आदि भाषाओं को भी सम्मिलित किया। श्रीरामचरितमानस पर बवाल सिर्फ दो बातों को लेकर हुआ- 

पहला; यह पूर्ण रूप से संस्कृत भाषा में क्यों नहीं है ? 

दूसरा; 'ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी' नामक चौपाई पर। 

(लेकिन कुछ लोग समय के बदलते दौर के साथ "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" आदि चौपाइयों का खण्डन करके श्रीरामचरितमानस की निंदा किया करते हैं।) 

उस समय बवाल इतना अधिक बढ़ गया कि श्रीरामचरितमानस को जला देने की स्थिति उत्पन्न हो गई। अनेक हिंदू धर्म के विद्वान इसके पक्ष में भी थे और विपक्ष में भी विद्वानों की कमी नहीं थी। बहुत बड़ी धार्मिक पंचायत हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि यदि भगवान भोलेनाथ की सहमति इस ग्रंथ को मिले, तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत। इसके लिए श्रीरामचरितमानस को वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रन्थों के नीचे रखा जाएगा और यह शर्त लगाई गई कि यदि सुबह यह ग्रंथ अपने आप सभी ग्रंथों के ऊपर रहेगा तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत माना जाएगा।

बिल्कुल ऐसा ही हुआ; श्रीरामचरितमानस को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रंथों के नीचे रखा गया और मुगल सैनिकों के कड़े पहरेदारी लगायी गयी और धर्मगुरुओं की देख रेख में, ताकि कोई रात्रि में मंदिर में प्रवेश न कर सके, कड़ी निगरानी रखी गयी। इसके पक्ष में जितने विद्वान थे उन्होंने भगवान हरि नाम कीर्तन करना प्रारंभ किया।

जब अर्धरात्रि हुई, तब मंदिर के सभी घंटे एकाएक जोर-जोर से बजने लगे और जब सुबह दरवाजा खोला गया तो श्रीरामचरितमानस सभी ग्रंथों के ऊपर था और उस पर भगवान शिव जी के द्वारा "सत्यम् शिवम् सुन्दरम् " नाम से हस्ताक्षर भी हो गये थे। यह घटना सभी को अचम्भित करके रख दी और शासक अकबर भी विचलित हो गया। तब जाकर के इस ग्रंथ को महत्ता मिली।

पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।। का अर्थ:

इस चौपाई का विरोध इतना अधिक किया जाता है कि नकारात्मक विचारधारा वाले लोगों द्वारा "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।" नामक चौपाई को तोड़ मरोड़ कर: 

"पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।. 
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न पूजहु वेद प्रबीना।।, 
पूजहि विप्र ज्ञान-गुण हीना, सूद्र न पूजहि वेद प्रवीणा।।" 

आदि तरह-तरह का रूप दे देकर अनेक प्रकार के भ्रामक लेख लिखे जाते हैं और भ्रामक विडियो बनाकर, तथा सम्मेलनों में गलत प्रकार से भाषण देकर श्रीरामचरितमानस की निंदा की जाती है। दरअसल श्रीरामचरितमानस की कुछ चौपाइयों के सहारे कुछ नकारात्मक विचारधारा वाले लोगों के द्वारा आजकल ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों विधियों द्वारा हिन्दू नवयुवकों व नासमझ हिन्दुओं को भ्रमित किया जाता है व श्रीरामचरितमानस का दुष्प्रचार किया जाता है। ताकि भोले-भाले हिन्दू लोग, हिन्दू धर्म से विमुख होकर अन्य धर्मों को ग्रहण कर लें। 

यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा विरचित श्रीरामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में 33वें व 34वें दोहे के बीच की दूसरी चौपाई है। पूरा अंश इस प्रकार है- 

संकुल लता बिटप घन कानन। 
बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।। 
आवत पंथ कबंध निपाता। 
तेहिं सब कही साप कै बाता।। 
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। 
प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।। 
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। 
मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।। 
दो0- मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। 
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।
सापत ताड़त परुष कहंता। 
बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।। 
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। 
सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। 
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। 
निज पद प्रीति देखि मन भावा।। 
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। 
गयउ गगन आपनि गति पाई।। 
ताहि देइ गति राम उदारा। 
सबरी कें आश्रम पगु धारा।। 
सबरी देखि राम गृहँ आए। 
मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।। 
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। 
जटा मुकुट सिर उर बनमाला।। 
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। 
सबरी परी चरन लपटाई।। 
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। 
पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। 
 सादर जल लै चरन पखारे। 
पुनि सुंदर आसन बैठारे।। 
दो0- कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। 
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।। 

श्री गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार इसका सही अर्थ इस प्रकार है: 

चूंकि हर चौपाई का संबंध अपनी अगली व पिछली चौपाई से रहता है। श्रीरामचरितमानस की किसी भी चौपाई का भाव समझने के लिए उसके ऊपर व नीचे की चौपाइयों को भी देखना/समझना चाहिए तथा सम्बन्धित चौपाई किस प्रसंग में और क्यों आया है; यह भी जानना नितांत आवश्यक है।

इस चौपाई (पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।) का संबंध भी पिछली चौपाई व राक्षस कबंध से है । हालांकि श्रीरामचरितमानस में कबंध राक्षस के बारे में कम विवरण है, अपितु महर्षि वाल्मीकि जी कृत रामायण में विस्तृत विवरण है। दअरसल, कबंध राक्षस द्वारा ऋषियों को परेशान करने के कारण, कबंध राक्षस को पूर्व जन्म में दुर्वासा ऋषि ने क्रोधित होकर श्राप दिया था। इसलिए यहॅं कबंध राक्षस, श्राप व ऋषि दुर्वासा जी के क्रोध को प्रभु श्री रामचन्द्र जी से बता रहा है। 

कबंध राक्षस श्री रामचन्द्र जी से कह रहा है कि मैं इस राक्षस रूप से पहले गन्धर्व था, लेकिन गलती के कारण मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप देकर राक्षस बना दिया था, जो कि यह राक्षस रूप आज आपके दर्शन से दूर हो गया। तब श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं कि, हे गन्धर्व! मैं तुमसे कहता हूॅं, सनो- मुझे ब्रह्म कुल द्रोही नहीं सुहाता। 

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।, इस चौपाई से अभिप्राय है कि, श्री रामचन्द्र जी ने कहा कि "सापत" अर्थात्‌ 'श्राप देता हुआ', "ताड़त" अर्थात्‌ 'डांटता-फटकारता 'हुआ और "परूष" अर्थात् 'कठोर वचन कहता हुआ' ब्राह्मण भी पूज्य है; ऐसा संत कहते हैं। 

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।, इस चौपाई का प्रत्येक शब्द गंभीर विचार के योग्य है, और जिनको हिन्दू धर्म व अवधी भाषा का पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं है, वे लोग इस चौपाई का गलत अर्थ निकालते हैं और सही अर्थ नहीं समझ पाते हैं। 

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना।; इस अर्ध चौपाई में 'बिप्र' शब्द का जो प्रयोग हुआ है, वह उस ब्राह्मण के लिए प्रयोग हुआ है, जो तपस्वी है। और 'सील गुन' शब्द का जो प्रयोग हुआ है, उसका तात्पर्य शील अर्थात्‌ मृदुलता या कोमलता वाले गुण से है। अर्थात् यदि तपस्वी ब्राह्मण का स्वभाव कठोर है या उसमें कोमलता नहीं है, तो भी वह पूजनीय है।

सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।; इस भाग का सही अर्थ निकालने के लिए आपको इसे दो भागों में बांटना पड़ेगा!

'सूद्र न गुन' अर्थात्‌ इन्हें शूद्र (तपस्या से हीन, मनोविकारों को वश में न रख सकने वाला, सेवक) मत समझ, 

'गन ग्यान प्रबीना' अर्थात्‌ इन्हें ज्ञान में प्रवीण मान  या ज्ञानी समझ। 'न गुन' का अर्थ- मत समझ। 'गन' का अर्थ- गीनो या मानो। 

इस वाक्य के पीछे श्री रामचन्द्र जी का अभिप्राय था, कि दुर्वासा जी के अवगुण (कठोरता) तो तू देख रहा है, लेकिन इनके जीवन में जो तप, त्याग, गुण और विशेषताएँ हैं; उनके ऊपर तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती।

अर्थात् दुर्वासा जी जैसा बिप्र भी पूजनीय है, क्योंकि संत जन भी उनकी महिमा को भलीभाँति जानते हैं कि दुर्वासा जी रुद्रांश हैं। 'क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा: रुष्टा तुष्टा क्षणे-क्षणे' जिनका स्वभाव है, लेकिन उनमें तपोबल व ज्ञान भी तो है । यदि इनमें 'सील गुन' अर्थात्‌ शील वाला गुण (कोमलता) नहीं है; तो क्या इन्हें शूद्र मान लिया जाए ? नहीं..! इनमें कोमलता नहीं है तो क्या हुआ, ये ज्ञान में तो प्रवीण हैं। 

श्रीरामजी कबंध से मिलने के पश्चात सीधे माँ शबरी (जो कि गैर ब्राह्मण, या भील जाति की हैं) के आश्रम पहुँचते है और वहाॅं श्री रामचंद्र जी का माँ शबरी के प्रति आदर तो सर्वजगत को विदित है। श्रीराम चन्द्र जी खुद शबरी के हाथों से दिये गये कन्द-मूल, फल, बेर आदि बहुत प्रेम से खाते हैं और शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश भी देते हैं। 

ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी - का सही अर्थ:

"ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" यह चौपाई रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में 58 व 59वें दोहे के बीच 6वीं चौपाई है। यह चौपाई समुद्र व श्री रामचन्द्र के बीच वार्तालाप की स्थिति का वर्णन करता है। पूरा अंश इस प्रकार है-

दो0- बिनय न मानत जलधि, जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
लछिमन बान सरासन आनू। 
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। 
सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। 
अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। 
ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। 
यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। 
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। 
जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। 
बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
दो0-काटेहिं पइ कदरी फरइ, कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु, डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
–*–*–
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। 
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। 
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। 
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। 
सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। 
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। 
सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। 
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। 
करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
दो0- सुनत बिनीत बचन अति, कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु, तात सो कहहु उपाइ।।59।।

जब भगवान श्री रामचंद्र जी समुद्र को पार करने के लिए समुद्र की इच्छा मांग रहे थे, तो समुद्र भगवान रामचंद्र जी की उपासना को नहीं समझ रहा था कि भगवान रामचंद्र जी क्या चाहते हैं ? 3 दिन तक समुद्र की पूजा करने के बाद भी समुद्र प्रगट नहीं हुआ, इसलिए श्री रामचंद्र जी ने क्रुद्ध होकर लक्ष्मण से कहा कि लक्ष्मण ! हमारा धनुष बाण लाओ; मैं अभी समुद्र को सुखा देता हूं। जब उन्होंने आग्नेयास्त्र का संधान किया तो पूरा समुद्र उबलने लगा। तब समुद्र ने डरकर अपना रूप धारण किया और श्री राम जी के सामने उपस्थित हुआ और वह इस प्रकार से श्री रामचंद्र जी की विनती कर रहा है कि हे प्रभु ! मुझे दास पर दया कीजिए!

अवधी भाषा में ' ताड़ना ' का अर्थ ' देखना (समझने के अर्थ में, परखना, भाँपना) ' होता है, साथ ही यह श्लेष अलंकार (बहू अर्थी) युक्त शब्द है अर्थात् प्रत्येक संज्ञा के लिए अलग प्रकार से अलग अर्थ; जैसे- "हमने तो उसकी बात पहले ही ताड़ दी थी या वह हमारी बात तुरंत ताड़ गया।"  

लेकिन लोग ताड़ना का अर्थ मारना-पीटना निकालते हैं और तुलसीदास जी द्वारा लिखे गए श्री रामचरितमानस की निंदा करते हैं; यह निंदा करने वालों की मूर्खता है। एक कहावत प्रचलित है “अर्थ का अनर्थ करना”, अर्थात् किसी चीज को यदि ठीक ढंग से ना समझा जाये तो उसका गलत अर्थ निकलता है। ठीक ऐसा ही इस दोहे के साथ वामपंथी विचारधारा के लोग करते हैं। विस्तृत और सही अर्थ इस प्रकार है -

ढोल: ढोल के विषय में ताड़ना शब्द का अर्थ इस प्रकार है- ढोल को जब तक पीटा ना जाये, अर्थात् जब तक उस पर थाप ना दी जाए, उसमें से ध्वनि नहीं निकल सकती और उसका कोई उपयोग नहीं होता। यही नहीं, उसकी ताड़ना भी संगीत सम्मत होनी चाहिए ताकि उसमें से ध्वनि लयबद्ध रूप से निकले ना कि उसका स्वर कर्कश हो जाता है। अर्थात् यह भी समझाने वाली चीज है, या आप अपने दिमाग से इसे जैसे जैसे बजाएंगे वैसे वैसे यह कार्य करेगा, बजेगा। ऐसा नहीं है कि बस सेट कर दिए और यह आवाज देने लगेगा।

गवांर: गवांर का अर्थ अज्ञानी होता है और यहां ताड़ना का अर्थ है दृष्टि रखना व समझाना। अज्ञानी को यदि कोई कार्य दिया जाए और उसपर दृष्टि ना रखी जाए तो वह कार्य वह कभी भी सही ढंग से नहीं कर सकता। इसीलिए जब तक किसी को किसी चीज के विषय में पूर्ण ज्ञान ना हो तब तक उसपर दृष्टि रखनी चाहिए। 

सूद्र: सबसे अधिक आपत्ति इसी शब्द पर होती है।  गुरु के सही ताड़न (मार्गदर्शन) के बिना वो गलत ज्ञान प्राप्त कर सकता है। शूद्र सिर्फ जाति से ही नहीं होते, कर्म से भी हो जाते हैं। कुछ मनुष्य अपनी इच्छा अनुसार ऐसे नीच कर्म करते हैं कि वह शूद्र में गिने जाते हैं, लेकिन शूद्र का असली अर्थ सेवक होता है और शूद्र का यह भी अर्थ होता है नीच कर्म करने वाला। और तुलसीदास जी की रचना में समुद्र का श्री रामचंद्र जी से कहने का कि यही तात्पर्य है कि शूद्र को भी सही रास्ते पर लाने के लिए शिक्षा की जरूरत होती है। शूद्र को ताड़ने का मतलब है कि शूद्र को समझाया जाए कि स्वामी की सेवा कैसे करनी है या यदि वह अपना कर्म कर रहा है तो उसे कैसे करना चाहिए।

पसु: पशुओं को हिन्दू धर्म में बहुत मूल्यवान माना गया है, इसीलिए उन्हें “पशुधन” कहा गया है। इनके विषय में ताड़न का अर्थ है देख-रेख करना। पशु बुद्धिहीन है, जिधर हांक दो, उधर चला जाएगा, किन्तु मूल्यवान है। अतः उसे हर समय सही देख-रेख की आवश्यकता होती है। जब पशु झुंड में चलते हैं तो एक व्यक्ति सदैव देखभाल के लिए उनके साथ होता है ताकि पशु इधर उधर ना भटक जाएं। उसी प्रकार खेत में हल जोतने वाला बैल केवल कृषक के वाणी मात्र से ये समझ जाता है कि उसे किस दिशा में मुड़ना है व कैसे चलना है।

नारी: इसपर भी सर्वाधिक आपत्ति होती है किंतु यहां नारी के विषय में ताड़ना का अर्थ है देखरेख, उनका ध्यान रखना एवं रक्षा करना। नारी समुद्र मंथन में निकली लक्ष्मी के समान पवित्र और आदरणीय है और इसीलिए ये आवश्यक है कि उनका सदैव ध्यान रखा जाए। 

हमारी पवित्र हिंदू संस्कृति ऐसे ही महान नहीं है, इसके कुछ संस्कार हैं, कुछ नैतिक मूल्य हैं; इसलिए हमारी हिंदू संस्कृति महान कही जाती है। स्त्री को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, उनका सदैव ध्यान रखना चाहिए और एक रत्न की भांति उनकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

हमारे हिंदू समाज के प्रत्येक लड़की या स्त्री जब भी कहीं जाती है, तो उसके परिवार वाले भाई या पिता या पति सभी को उसके स्थिति की चिंता रहती है और वह उसकी सुरक्षा के लिए उसके साथ जाते हैं। स्त्रियों की सुरक्षा से संबंधित अनेक नियम हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में स्थान स्थान पर दिए गए हैं और हिंदू लोग उसका पालन भी करते हैं।

समय व परिस्थिति के अनुकूल हिन्दू या सनातनी स्त्रियाँ युद्ध, व्यवसाय इत्यादि सभी कर्म करती हैं, जैसा कि हिन्दू धर्म आदेश देता है।

निष्कर्ष:

तुलसीदास का साहित्य न सिर्फ धार्मिक और भक्तिकाल के साथ जुड़ा था, बल्कि उन्होंने लोगों के अधिकारों की रक्षा करने वाले काव्य भी रचे। उनका यह कविता भूमिहीन लोगों के दर्दों और दुखों को बयां करती है और समाज में जागरूकता पैदा करती है।